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जलतरंग

आज का लेख, जलतरंग

तब हर पल होली हो जाता है…

अरुण तिवारी जब घुप्प अमावस के द्वारेकुछ किरणें दस्तक देती हैं,सब संग मिल लोहा लेती हैं,कुछ शब्द, सूरज बन जाते हैं, तब नई सुबह हो जाती है,नन्ही कलियां मुसकाती हैं,हर पल नूतन हो जाता है,हर पल उत्कर्ष मनाता है, तब मेरे मन की कुंज गलिन मेंइक भौंरा रसिया गाता है,पल-छिन…

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पुलवामा घात में अमर हुए सी आर पी एफ के शहीदों को नमन करते हुए एक गंगा प्रश्न

उन को वंदन, उन पर क्रंदन,
बदला-बदले की आवाज़ें,
शत्-शत् करती मैं उन्हे नमन्,
पर इन पर चुप्पी कितनी जायज़,
खुद से पूछो, खुद ही जानो,
खुद का करतब पहचानो,
मैं गंगा तुम से पूछ रहीं…

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आज का लेख, जलतरंग, पानी लेख, प्रकृति लेख

पानी प्रणय पक्ष

लेखक : अरुण तिवारी आतुर जल बोला माटी सेमैं प्रकृति का वीर्य तत्व हूं,तुम प्रकृति की कोख हो न्यारी।इस जगती का पौरुष मुझमें,तुममें रचना का गुण भारी।नर-नारी सम भोग विदित जस,तुम रंग बनो, मैं बनूं बिहारी।आतुर जल बोला माटी से…. न स्वाद गंध, न रंग तत्व,पर बोध तत्व है अनुपम…

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मैं देवदार का घना जंगल

लेखक: अरुण तिवारी मैं देवदार का घना जंगल,गंगोत्री के द्वार ठाड़ा,शिवजटा सा गुंथा निर्मलगंग की इक धार देकर,धरा को श्रृंगार देकर,जय बोलता उत्तरांचल की,चाहता सबका मैं मंगल,मैं देवदार का घना जंगल… बहुत लंबा और ऊंचा,हिमाद्रि से बहुत नीचा,हरीतिमा पुचकार बनकर,खींचता हूं नीलिमा को,मैं धरा के बहुत नीचे, सींचता हूं खेत को…

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न्यू इण्डिया के नारे के बीच पानी, खेती और शहरों की तसवीर तथा बाजार व सरकार के रवैये को सामने रखती एक कविता

यह न्यू इण्डिया है…रचनाकार : अरुण तिवारी 1.  पानी बूंदा है, बरखा है,पर तालाब रीते हैं।माटी के होंठ तक कई जगह सूखे हैं।भूजल की सीढ़ी के नित नये डण्डे टूटे हैं।गहरे-गहरे बोर नेकई कोष लूटे हैं।शौचालय का शोर भी कई कोष लूटेगा।स्वच्छ नदियों का गौरव बचा नहीं शेष अब,हिमनद के आब तकपहुंच गई आग आज,मौसम की चुनौतीघर…

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arun tiwari and river ganga
आज का लेख, जलतरंग, नदी लेख, समय विशेष

गंगा तट से बोल रहा हूं : अरुण तिवारी

हंसा तो तैयार अकेला , तय अब हम को ही करना है  स्वामी ज्ञानस्वरूप सानंद (प्रो जी डी अग्रवाल जी ) के गंगा अनशन (वर्ष 2013) पर छाई चुप्पी से व्यथित होकर अनशन के 100वें दिन श्री अरुण तिवारी ने एक अत्यंत मार्मिक आहृान किया था। मातृ सदन के स्वामी…

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जलतरंग

बूंद-बूंद संचयन के प्रेरणा बोल

( सूखे के संकट समय में बारिश की नन्ही बूंदों के संचयन में समाधान को शब्द देने की कोशिश में श्रीमती शालिनी तिवारी के हाथों सहज ही रच गई एक कविता : पानी पोस्ट टीम ) बूंद-बूंद जब संचयन होगा —————————– जल से कल था, आज भी है औ आने वाला समय…

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इन दिनों धरती बेहद उदास है……..

 रचनाकार : अरुण तिवारी ————————————————————– कहते हैं, इन दिनों धरती बेहद उदास है। इसके रंजो-ग़म के कारण कुछ खास हैं। कहते हैं, धरती को बुखार है; फेफङे बीमार हैं। कहीं काली, कहीं लाल, पीली, तो कहीं भूरी पङ गईं हैं नीली धमनियां। कहते हैं, इन दिनों…. कहीं चटके… कहीं गादों…

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